रविवार, 25 नवंबर 2018

वरिष्ठ कांग्रेसी सदस्य, सांसद, पूर्व मंत्री कमलनाथ को "सच" पता है.

वरिष्ठ कांग्रेसी सदस्य, सांसद, पूर्व  मंत्री कमलनाथ को "सच" पता है.

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मैं कमलनाथ जी का हृदय से आभारी हू. उनके हाल ही में लीक हुए कुछ वीडियो से उन्होंने मेरी अवधारणा को सही सिद्ध कर दिया  है

कि 1989 से लेकर अब तक कांग्रेस एक समुदाय विशेष के सामूहिक वोटों के खातिर चुनाव जीतती आई है.

चूंकि यह समुदाय अन्य लोगो की तुलना में अधिक से अधिक संख्या में आकर वोट करता है, अतः कुल पड़े वोटों में इनका प्रभाव समस्त मतदाताओं के अनुपात में विषम रूप में अधिक हो जाता है.

नहीं तो ऐसा हो ही नहीं सकता था कि बहुसंख्यक जनता में 2008 के मुंबई आतंकवादी हमले के बाद भारी नाराजगी के बाद भी 2009 के चुनाव में कांग्रेस चुनाव जीत जाती.

इन विशेष वोटो को अपनी "जेब" में रखने के बाद कांग्रेस को हर चुनाव क्षेत्र में किसी अन्य दबंग जाति के वोटो को प्रलोभन, शिकायत, डर, पहचान के मुद्दे पे अपनी और खींचना था; और सत्ता उनके "हाथ" में.

स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1989 तक हर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 39-40% से अधिक वोट प्राप्त किया.

सिर्फ 1977 में कांग्रेस का वोट शेयर 35% से कम रह गया था.

फिर 1996 से लेकर 2009 के चुनाव तक कांग्रेस का वोट शेयर 25 से 29% के बीच में रहा.

2008 में मुंबई आतंकवादी हमले के बाद भी 2009 के चुनाव में इस पार्टी को 28.55% वोट मिला.

चूंकि सत्ता का चुनावी गणित बैठा लिया था, अतः स्वतंत्रता के बाद से ही एक ही परिवार के लोगो ने सत्ता पे कब्ज़ा कर लिया. परिवार के बाहर जो लोग प्रधानमंत्री बने - चाहे वे किसी भी पार्टी के हो, उदहारण के लिए गुलजारीलाल नंदा, शास्त्री जी, मोरार जी देसाई, चरण सिंह, वी पी सिंह, चंद्रशेखर, नरसिम्हा राओ, देवे गौड़ा, गुजराल, मनमोहन को ले लीजिये,

वे सब के सब किसी दुर्घटना या मृत्यु (गुलजारीलाल नंदा, शास्त्री) जोड़-तोड़ (वी पी सिंह, चंद्रशेखर), परिवार के सदस्य का सत्ता के लिए रेडी ना होना (शास्त्री, नरसिम्हा राओ, मनमोहन),

प्रधानमंत्री पद के लिए गठबंधन में एकमत नहीं होने (मोरार जी, चरण सिंह, देवे गौड़ा, गुजराल) के कारण सरकार प्रमुख बन पाए.

वाजपेयी जी प्रधानमंत्री अवश्य बने, लेकिन अन्य पार्टियों के समर्थन से.

नहीं तो ऐसा हो ही नहीं सकता था कि बहुसंख्यक जनता में 2008 के मुंबई आतंकवादी हमले के बाद भारी नाराजगी के बाद भी 2009 के चुनाव में कांग्रेस चुनाव जीत जाती.

इस चुनाव में लगभग 71 करोड़ मतदाता थे, जिनमे से लगभग 10 करोड़ अल्पसंख्यक थे.

लगभग 60% या 42.6 करोड़ लोगो ने वोट डाला, जिसमे से कांग्रेस को लगभग 12 करोड़ वोट मिले.

अगर इन 10 करोड़ में से 90  प्रतिशत भी मतदान कर दे, यानी कि 9 करोड़ वोट, तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अधिकतम वोट किस पार्टी को गए होंगे.

बचे 4-5 करोड़ वोट शाही परिवार और खानदानी कैंडिडेट किसी अन्य समूह से खींच ले जाएंगे.

2014 के चुनाव में 55 करोड़ लोगो ने मतदान किया जिसमे कांग्रेस को लगभग 19 प्रतिशत वोट मिले, यानी कि 10.45 करोड़ मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट दिया जो मोटे तौर पे एक समुदाय द्वारा डाले गए वोटो से मिलता जुलता नंबर है.

उस समय के टीवी और समाचारपत्रों में छपे चुनाव विश्लेषण की सत्यनिष्ठा पे मुझे संदेह होता है कि फलाने समुदाय ने इतने प्रतिशत वोट ढीकानी पार्टी को दिया.

यह सारे के सारे पत्रकार और बुद्धिजीवी चुनाव पश्चात वोटरों की बुद्धिमता की प्रशंसा करके बहुसंख्यक मतदाताओं के हाथ में झुनझुना पकड़ा देते थे. अब यह स्पष्ट होने लगा है कि इनके सोर्स और आंकड़े संदिग्ध और पक्षपाती है और यह मनगढ़ंत कहानी लिखते है.

वरिष्ठ कांग्रेसी सदस्य, सांसद, पूर्व  मंत्री कमलनाथ को "सच" पता है.

भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है कि शाही परिवार के बाहर के किसी व्यक्ति का नाम चुनाव पूर्व प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित कर दिया गया हो और वह व्यक्ति - अति पिछड़े वर्ग के निर्धन परिवार का सदस्य - अपने बल बूते पे चुनाव जीत के प्रधानमंत्री बना हो.

तभी कांग्रेस तथा अन्य परिवादवादी दल उस व्यक्ति - नरेंद्र मोदी - को हराने के लिए जी जान से गठबंधन बना रहे है. क्योकि अगर प्रधानमंत्री मोदी पुनः चुनाव जीत गए तो यह अन्य दलों के व्यक्तिगत कैंडिडेट की हार नहीं होगी.

बल्कि, उन परिवारों की निजी संपत्ति - उनकी अपनी प्राइवेट लिमिटेड पार्टी - दिवालिया हो जायेगी.

तभी कमलनाथ समुदाय विशेष से 90% प्रतिशत मतदान चाहते है.

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