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सोमवार, 13 सितंबर 2021

घर की छत का करे सदुपयोग, सब्जी उगाकर बढ़ाये धनयोग, सेहत,धन,संतुष्टि के मिलेगा सरकारी सहयोग


 घर की छत का करे सदुपयोग, सब्जी उगाकर बढ़ाये धनयोग, सेहत,धन,संतुष्टि के मिलेगा सरकारी सहयोग

खेती में आजकल नयी तकनीक के साथ ही अब यह आसान हो गया है. अब इसमें पहले की पारंपरिक खेती की तरह मिट्टी, ढेर सारा पानी और जमीन की जरूरत नहीं पड़ती है. कृषि क्षेत्र में नयी तकनीकों के समावेश ने खेती को इतना आसान बना दिया है कि अब आप इसे घर की छत से लेकर अपने छोटे से आंगन में लगा सकते है, इसी तरह की एक तकनीक है हाइड्रोपोनिक्स फार्मिंग. इस खेती में मिट्टी की जरूरत नहीं पड़ती है. इस तकनीक से खेती करके किसान मोटी कमाई कर सकते हैं.

हाइड्रोपोनिक या मिट्टी के बगैर खेती की ये तकनीक आज से नहीं, बल्कि सैकड़ों सालों से अपनाई जाती रही. ग्रीन एंड वाइब्रेट वेबसाइट के मुताबिक 600 ईसा पूर्व भी बेबीलोन में हैंगिंग गार्डन (Hanging Gardens of Babylon) मिलते थे, जिसमें मिट्टी के बिना ही पौधे लगाए जाते थे. 1200 सदी के अंत में मार्को पोलो ने चीन की यात्रा के दौरान वहां पानी में होने वाली खेती देखी, जो इसका बेस्ट उदाहरण हैं. बिना मिट्टी के थोड़ी सी जगह में तेजी से खेती करने का ये एक बढ़िया तरीका है, जिसमें पानी की जरूरत भी तकनीक की मदद लेने पर कम हो जाती है. हालांकि शुरुआत में इसपर खर्च करना पड़ता है ताकि सारे उपकरण लिए जा सकें और साथ ही इसकी ट्रेनिंग भी जरूरी है. एक मुश्किल ये भी है कि जहां पौधे उगाए जा रहे हों, वहां बिजली की कटौती नहीं होनी चाहिए, वरना पानी न मिलने और तापमान ऊपर-नीचे होने के कारण पौधे कुछ ही घंटों में खराब हो सकते हैं.

कैसे काम करती है तकनीक
इस तकनीक में सिर्फ पानी के जरिये ही सब्जियां उगायी जाती है. इसमें पाइप में पोषणयुक्त पानी बहती है, जिसके उपर पौधे लगाये जाते हैं. पौधों की जड़े उससे अपना न्यूट्रिशन लेती है. बाजार में हाइड्रोपॉनिक्स तकनीक के कई मॉडल उपलब्ध हैं. इस तकनीक से पानी बेहद कम खर्च होता है. इसमें पारालाइट और कोकपिट की जरूरत होती है.

कैसे करते हैं खेती
इस तकनीक में पारालाइट और कोकोपिट को मिलाकर एक छोटे से डिब्बे में रखा जाता है. एक बार डिब्बा में कोकोपिट और पारालाइट का मिश्रण भरने के बाद इसे चार से पांच सालं तक इस्तेमाल किया जा सकता है. इस डिब्बे में पहले बीज की बुवाई की जाती है. फिर जब इसमें पौधे निकल जाते हैं तब इन डिब्बों को पाइप के उपर बने छेद में रख दिया जाता है, जिन पाइप में पोषणयुक्त पानी बहता है. मजेदार बात यह है कि इसमें काम करने में आपके हाथ गंदे नहीं होते हैं. इसमें डिब्बे के नीचे छेद किया जाता है. इस तकनीक में आप अपनी जगह की उपलब्धता है हिसाब से मॉडल तैयार कर सकते हैं.

अब बात करते हैं इस तकनीक के बारे में. इसके लिए एक आसान-सा उदाहरण हैं. आपने कभी अपने घर या कमरे में पानी से भरे ग्लास में या किसी बोतल में किसी पौधे की टहनी रख दी हो तो देखा होगा कि कुछ दिनों के बाद उसमें जड़ें निकल आती हैं और धीरे-धीरे वह पौधा बढ़ने लगता है.

अक्सर हम सोचते हैं कि पेड़-पौधे उगाने और उनके बड़े होने के लिये खाद, मिट्टी, पानी और सूर्य का प्रकाश जरूरी है. लेकिन असलियत यह है कि फसल उत्पादन के लिये सिर्फ तीन चीजों – पानी, पोषक तत्व और की जरूरत है.
देखा गया है कि इस तकनीक से पौधे मिट्टी में लगे पौधों की अपेक्षा 20-30% बेहतर तरीके से बढ़ते हैं. इसकी वजह ये है कि पानी से पौधों को सीधे-सीधे पोषण मिट्टी जाता है और उसे मिट्टी में इसके लिए संघर्ष नहीं करना होता. साथ ही मिट्टी में पैदा होने वाले खतपतवार से भी इसे नुकसान नहीं हो पाता है.

सब्जी की क्वालिटी बेहतर होती है
हाइड्रोपॉनिक्स तकनीक से खेती कर रहे किसान विशाल माने बताते हैं कि इस तकनीक से सब्जी उगाने से सब्जी की गुणवत्ता काफी अच्छी रहती है. साथ ही इनमें पोषण की कमी नहीं होती है क्योंकि इन्हें पोषणयुक्त आहार देकर उगाया जाता है. उनके फार्म में 11 प्रकार की सब्जियां उगायी जाती है. इनमें बैगन की चार वेराइटी है, साथ ही टमाटर भी लगे हुए हैं. इस तकनीक में मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता है कि इसलिए इसमें कीट और बीमारी का प्रकोप ना के बराबर होता है. इसके साथ ही इसकी न्यूट्रिशन वैल्यू भी काफी अच्छी होती है. धनिया का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जमीन में खेती करने पर किसान साल भर में छह बार धनिया उगा सकते हैं. पर इस तकनीक से साल में 15 से 16 बार धनिया की फसल ले सकते हैं.

कितनी होगी कमाई
अगर कोई अपने घर से इस तकनीक को इस्तेमाल करते हैं औ्र सब्जी उत्पादन करते हैं तो महीने में 30-40 हजार रुपए कमाई होगी. अगर कोई एक एकड़ में इस तकनीक का इस्तेमाल करके खेती करते हैं तो चार से पांच लाख रुपए कमा सकते हैं. बंजर जमीन पर भी इसकी खेती की जा सकती है. इसके लिए न्यूनतम 25 हजार से लाख रुपए की लागत से इसकी शुरूआत की जा सकती है.

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