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शुक्रवार, 27 मार्च 2026
'धुरंधर 2' प्रोपेगेंडा नहीं है, यह फिल्म उन लोगों की 'बौद्धिक नसबंदी' है जो आतंकवाद को 'भटके हुए नौजवानों का गुस्सा' बताते थे।"
#अतीक और #अतीफ का तो मुद्दा ही नहीं है। उसे बंद करिए। कंट्रोवर्सी गई तेल लेने। हां ये है कि अगर आप उन लोगों में से हैं जिन्हें धमाकों की गूँज से ज्यादा आतंकियों के 'मानवाधिकार' की चिंता सताती है, तो 'धुरंधर 2' आपके लिए सिनेमा नहीं, 'कच्चा सुलगता कोयला' है। निर्देशक ने उन लोगों की बखिया उधेड़ दी है जो दिल्ली से लेकर मुंबई तक लाशों के ढेर पर अपनी राजनीति की रोटियाँ सेंकते थे।
फिल्म का सबसे 'जहरीला' (उनके लिए जो इसे पचा नहीं पाएंगे) प्रहार उस 0.5 फ्रंट पर है। यह वह फ्रंट है जो सीमा पर बंदूक नहीं चलाता, बल्कि स्टूडियो और ड्राइंग रूम में बैठकर आतंकियों के लिए 'ग्राउंड' तैयार करता है।
"फिल्म में उन बुद्धिजीवियों की धज्जियां उड़ाई गई हैं जो आतंकियों के एनकाउंटर पर आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं, पर फटे हुए चिथड़ों में अपनों को ढूंढते आम आदमी के लिए उनके पास सिर्फ 'शांति' का ज्ञान होता है।"
रणवीर सिंह ने इस फिल्म में 'पुलिस' का किरदार नहीं निभाया, बल्कि उन करोड़ों भारतीयों के 'गुस्से' को परदे पर उतारा है। जब वे 2008 के सूरत में उन 26 बमों को डिफ्यूज करते हैं, तो वह केवल बारूद नहीं, बल्कि उस 'प्रशासनिक सुस्ती' को भी डिफ्यूज करते हैं जिसने देश को नरक बना दिया था।
फिल्म साफ कहती है कि "शांति की अपील" से बम नहीं रुकते, बम रुकते हैं उस 'इरादे' से जो दुश्मन के घर में घुसकर उसका हिसाब चुकता करना जानता हो।
2005-2013 का वो खूनी दौर दिखा है जब वाराणसी की आरती हो या दिल्ली की दिवाली, अहमदाबाद की सड़कें हों या मुंबई की ट्रेनें—फिल्म ने एक-एक कर उन 24 जख्मों को कुरेदा है।
अतीफ अहमदजैसे गुर्गों और उनके विदेशी आकाओं के बीच के उस 'पवित्र' गठबंधन की ऐसी-तैसी कर दी गई है, जिसे सालों तक 'भाईचारा' कहकर पाला गया।
फिल्म का वो हिस्सा जहाँ 'टेरर-कैश' को कागज का टुकड़ा बनते दिखाया गया है, वह उन लोगों के गाल पर लाल निशान छोड़ जाएगा जो आज भी उस फैसले पर छाती पीटते हैं
'धुरंधर 2' प्रोपेगेंडा नहीं है, यह उन लोगों के लिए 'कड़वा सच' है जिनकी दुकान 'अस्थिर भारत' से चलती थी। यह फिल्म उन गिरगिटों की पहचान कराती है जो तिरंगे की आड़ में पड़ोस के झंडे को सलाम करते हैं।
'धुरंधर 2' केवल एक फिल्म नहीं है, यह उन 24 हमलों की याद दिलाती एक 'चेतावनी' है। यह फिल्म उन लोगों के गाल पर करारा तमाचा है जो पाकिस्तान के 'समर्थन' और भारत के 'विरोध' की महीन लकीर पर सर्कस करते हैं।
"अगर इस फिल्म को देखकर आपको दर्द हो रहा है, तो समझ लीजिए कि फिल्म का निशाना बिल्कुल सटीक लगा है। यह फिल्म उन लोगों की 'बौद्धिक नसबंदी' है जो आतंकवाद को 'भटके हुए नौजवानों का गुस्सा' बताते थे।"
"अगर आप 'लिबरल' चश्मा उतारकर देखेंगे, तो आपको इसमें देश का दर्द दिखेगा। और अगर चश्मा लगा रहा, तो यकीनन आपको यह प्रोपेगेंडा ही लगेगा।"
#Dhurandhar2 #ExposingTheTraitors #0Point5Front #RanveerSingh #IndiaFightsBack #JusticeServed
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