लेंसकार्ट कवर-अप: हिंदू घृणा की कॉर्पोरेट कहानी
कभी-कभी किसी बड़ी कंपनी की असली कहानी प्रेस रिलीज़ या विज्ञापनों में नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे दस्तावेज़ों में छिपी होती है जिन्हें आम तौर पर कोई पढ़ता भी नहीं. Lenskart — एक $5.6 बिलियन की कंपनी, IPO की दहलीज पर खड़ी — ऐसी ही एक कहानी के केंद्र में आ गई, जब उसका एक “स्टाइल गाइड” 15 अप्रैल को सार्वजनिक हो गया.
पहली नज़र में यह एक सामान्य कॉर्पोरेट गाइडलाइन लग सकती थी — कर्मचारियों के पहनावे और प्रस्तुति से जुड़ी बातें. लेकिन जैसे-जैसे लोग इसे पढ़ते गए, सवाल उठने लगे. गाइडलाइन में साफ लिखा था कि बिंदी, तिलक और कलावा जैसे धार्मिक प्रतीकों की अनुमति नहीं है. सिंदूर की बात भी थी, लेकिन सीमित और माथे पर नहीं. इसके उलट, हिजाब को न सिर्फ अनुमति दी गई थी, बल्कि उसके रंगों तक के निर्देश और ट्रेनिंग वीडियो देने की बात कही गई थी.
यह अंतर ही पूरे विवाद का केंद्र बन गया..
जब यह दस्तावेज़ वायरल हुआ, तो Peyush Bansal ने इसे “गलत” और “भ्रामक” बताया. लेकिन यह सफाई ज्यादा देर टिक नहीं पाई. सामने आया कि दस्तावेज़ कंपनी का ही था, फरवरी 2026 का, और आधिकारिक रूप से इस्तेमाल में था. इसके बाद बयान बदला गया — इसे “पुराना ट्रेनिंग डॉक्यूमेंट” कहा गया, जिसमें एक “गलत लाइन” थी, जिसे 17 फरवरी को हटा दिया गया था.
अगर कहानी यहीं खत्म हो जाती, तो शायद यह एक साधारण कॉर्पोरेट गलती मान ली जाती, लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है..
पुणे के एक स्टोर मैनेजर, आकाश फालके, ने महीनों पहले ही इस पॉलिसी पर सवाल उठाए थे. नवंबर 2025 में उन्होंने HR को लिखा, दिसंबर में फिर याद दिलाया...जनवरी और फरवरी 2026 में, स्टोर ऑडिट के दौरान कर्मचारियों के वेतन में कटौती तक की जा रही थी — सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने बिंदी या तिलक पहना था. साफ था कि यह सिर्फ एक दस्तावेज़ नहीं था; यह ज़मीन पर लागू की जा रही नीति थी...
जब अंदर से कोई सुनवाई नहीं हुई, तो फालके ने मामला आगे बढ़ाया. 20 फरवरी को उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के grievance portal पर शिकायत दर्ज की...उसी दिन उनकी नौकरी चली गई.
यह घटना अपने आप में बहुत कुछ कहती है, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती.
सूरत के ज़ील सोगासिया को नौकरी का ऑफर मिला और ट्रेनिंग के लिए नवी मुंबई बुलाया गया...पहले ही दिन उन्हें कहा गया कि अपनी शिखा कटवानी होगी, तिलक हटाना होगा, और धार्मिक टैटू भी हटाने होंगे — वरना नौकरी नहीं मिलेगी. उन्होंने इनकार किया, अगले ही दिन उन्हें निकाल दिया गया.
यह अप्रैल 2026 की बात है, यानी उस दावे के लगभग दो महीने बाद, जिसमें कहा गया था कि ऐसी पॉलिसी पहले ही हटा दी गई है.
इन घटनाओं को जोड़कर देखें, तो एक पैटर्न उभरता है. पांच महीनों तक दो कर्मचारियों ने अंदर से इस मुद्दे को उठाया. दोनों को नजरअंदाज किया गया. एक को शिकायत करने पर निकाल दिया गया, दूसरे को अपनी पहचान न बदलने पर. दूसरी तरफ, कंपनी का आधिकारिक पक्ष बार-बार बदलता रहा — हर बार, जब नया तथ्य सामने आया.
यही वह जगह है जहां यह कहानी सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं रहती. यह उस तरीके को दिखाती है, जिससे आज के कॉर्पोरेट सिस्टम में भेदभाव काम करता है. यह खुले तौर पर नहीं आता, न ही बड़े-बड़े बयानों में दिखता है. यह आता है गाइडलाइनों में, ऑडिट रिपोर्ट्स में, और उन चुपचाप लिए गए फैसलों में, जिनका असर सीधे लोगों की रोज़ी-रोटी पर पड़ता है.
सब कुछ इतना व्यवस्थित और “नॉर्मल” बना दिया जाता है कि सवाल उठाना ही असामान्य लगने लगता है.
शायद यही कारण है कि यह सब इतने समय तक बिना शोर के चलता रहा, और शायद यही कारण है कि एक लीक हुआ PDF इतना बड़ा असर डाल गया.
क्योंकि कभी-कभी, एक दस्तावेज़ ही पूरी कहानी बदल देता है.
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