गुरुवार, 6 जून 2013

सम्मोहन एक कला ( हिप्नोटिज्म)

सम्मोहन एक कला ( हिप्नोटिज्म)



सम्मोहन (Hypnosis) वह कला है जिसके द्वारा मनुष्य उस अर्धचेतनावस्था में लाया जा सकता है जो समाधि, या स्वप्नावस्था, से मिलती-जुलती होती है, किंतु सम्मोहित अवस्था में मनुष्य की कुछ या सब इंद्रियाँ उसके वश में रहती हैं। वह बोल, चल और लिख सकता है; हिसाब लगा सकता है तथा जाग्रतावस्था में उसके लिए जो कुछ संभव है, वह सब कुछ कर सकता है, किंतु यह सब कार्य वह सम्मोहनकर्ता के सुझाव पर करता है।
इतिहास
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भारत में अति प्राचीन काल से सम्मोहन तथा इसी प्रकार की अन्य रहस्यमय, अद्भुत प्रभावोत्पादक, गुप्त क्रियाएँ प्रचलित हैं। अन्य पूर्वी देशों में भी ये अज्ञात नहीं रही हैं। यह निश्चय है कि यदि सबने नहीं तो इनमें से अधिकांश ने इन क्रियाओं का ज्ञान भारत से प्राप्त किया, जैसे तिब्बत ने। नटों, साधुओं तथा योगियों में इन क्रियाओं के जाननेवाले पाए जाते हैं। इन विशिष्ट मंडलों के लोगों को छोड़कर अन्य मनुष्यों में इनका ज्ञान बहुत थोड़ा, या कुछ भी नहीं, रहता। अनधिकारी के ज्ञाता होने से अनिष्ट की आशंका समझ, पूर्वी देशों में इस विषय के समर्थ लोगों ने इसे सर्वथा गोपनीय रखा। इस कारण आज भी इस संबंध में जो कुछ निश्चित रूप से लिखा जा सकता है वह यूरोप की देन है, जहाँ इसका वैज्ञानिक अध्ययन करने की चेष्टा की गई है।

अठारहवीं सदी के मध्य में फ्रांज़ ए. मेस्मर नामक वियना के एक चिकित्सक ने सर्वप्रथम सम्मोहन का अध्ययन प्रारम्भ किया। इन्होंने कुछ सफलता तथा बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त की, किंतु इस संबंध में जिन सिद्धांतों की इन्होंने कल्पना की वे गलत सिद्ध हुए। जो सिद्धांत आजकल स्वीकृत हैं, उनका विवेचन लीबाल्ट (Liebault) तथा वेर्नहाइम (Bernheim) नामक दो फ्रांसीसी डाक्टरों ने किया था। इनके अनुसार सम्मोहन का अनिवार्य प्रवर्तक सुझाव या प्रेरणा का संकेत होता है।
स्वरूप
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यह निश्चित रूप से समझ लेना चाहिए कि सम्मोहनकर्ता जादूगर, अथवा दैवी शक्तियों का स्वामी, नहीं होता। मनुष्यों में से अधिकांश प्रेरणा या सुझाव के प्रभाव में आ जाते हैं। यदि कोई आज्ञा, जैसे "आप खड़े हो जाँए" या "कुर्सी छोड़ दें", हाकिमाना ढंग से दी जाए, तो बहुत से लोग इसका तुरंत पालन करते हैं। यह तो सभी ने अनुभव किया है कि यदि हम किसी को उबासी लेते देखते हैं, तो इच्छा न रहने पर भी स्वयं उबासी लेने लग जाते हैं। दूसरों के हँसने पर स्वयं भी हँसते या मुस्कराते हैं तथा दूसरों को रोते देखकर उदास हो जाते हैं।
जो लोग दूसरों के सुझावों को इच्छा न रहते हुए भी मान लेते हैं, वे सरलता से सम्मोहित हो जाते हैं। सम्मोहित व्यक्ति के व्यवहार में निम्नलिखित समरूपता पाई जाती है :
आज्ञाकारिता
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कुछ लोगों का मत है कि जो मनुष्य पूर्ण रूप से सम्मोहित हो जाता है वह सम्मोहनकर्ता की दी हुई सब आज्ञाओं का पालन करता है, किंतु कुछ अन्य का कहना है कि सम्मोहित व्यक्ति के विश्वासों के अनुसार यदि आज्ञा अनैतिक या अनुचित हुई, तो वह उसका पालन नहीं करता और जाग जाता है।
मिथ्या प्रतीति तथा भ्रम
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सम्मोहनकर्ता यदि कहता है कि दो और दो सात होते है, तो सम्मोहित व्यक्ति इसे मान लेता है। यदि उसे कहता है कि तुम घोड़ा हो, तो वह व्यक्ति हाथों और घुटनों के बल चलने लगता है।
मतिविभ्रम
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सम्मोहित व्यक्ति को ऐसी वस्तुएँ जो उपस्थित नहीं है दिखाई तथा सुनाई जा सकती है और उनका स्पर्श व अनुभव कराया जा सकता है। इस अवस्था में यह भी मनवाया जा सकता है कि वह वस्तु उपस्थित नहीं है जो वास्तव में उपस्थित है। यदि प्रेरणा दी जाए कि जिस कुर्सी पर सम्मोहित व्यक्ति बैठा है वह वहाँ नहीं है, तो वह व्यक्ति मुँह के बल जमीन पर लुढ़क जाएगा।
ज्ञानेंद्रियों पर प्रभाव
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सम्मोहनकर्ता के सुझाव पर सम्मोहित व्यक्ति के शरीर का कोई भाग सुन्न हो जा सकता है, यहाँ तक कि उस भाग को जलाने पर भी उसे वेदना न हो। इंद्रियों को तीव्र बनानेवाली प्रेरणा भी कार्यकारी हो सकती है, जिससे सम्मोहित व्यक्ति असाधारण बल का प्रयोग कर सकता है, या कही हुई बात को भी दूर से सुन सकता है।
परासंमोहन विस्मृति
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साधारणतया सम्मोहनावस्था में हुई सब बातों को सम्मोहित व्यक्ति भूल जाता है।
सम्मोहनोत्तर प्रेरणा
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व्यक्ति की सम्मोहनावस्था में दिए हुए सुझावों या आज्ञाओं का, पूर्ण चेतनता प्राप्त करने पर भी, वह पालन करता है। यदि उससे कहा गया है कि चैतन्य होने के दस मिनट बाद नहाना, तो उतना समय बीतने पर वह अपने आप ऐसा ही करता है।
दैनिक जीवन में सम्मोहन
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प्रतिदिन के जीवन में सम्मोहन के अनेक दृष्टांत मिलते हैं। राजनीतिक या धार्मिक नेता अपने भाषणों से लोगों को सम्मोहित कर लेते हैं। आत्मसम्मोहन भी संभव है। किसी चमकीली वस्तु पर दृष्टि स्थिर रखकर यह अवस्था उत्पन्न की जा सकती है। अत्यधिक उत्तेजना, भय आदि से मनुष्य सम्मोहित अवस्था जैसा व्यवहार करने लगता है, या उत्तेजना के क्षण के पहले या बाद की घटनाओं को भूल जाता है। वह कौन है, उसका पिछला जीवन क्या था, यह भी भूल जा सकता है।
आकस्मिक शारीरिक चोट, मानसिक क्षोभ, अथवा उत्तेजना के कारण, हाथ पैर रहते कभी कभी मनुष्य लूले या लँगड़े के सदृश व्यवहार करने लगता है, दृष्टि का लोप हो जाता है, अथवा वह नींद में ही चलने फिरने लग जा सकता है। दृष्टि विभ्रम, या जाग्रत अवस्था में स्वप्न देखने के अनेक उदाहरण मिलते हैं। धार्मिक उत्तेजना से सम्मोहित होकर कुछ लोग अनजाने अर्धचेतनावस्था में हो जाते हैं और कल्पित होकर कुछ लोग अनजाने अर्धचेतनावस्था में हो जाते हैं और कल्पित दृश्य या वस्तुएँ देखते या सुनते हैं। बाद में उन्हें विश्वास हो जाता है कि यह सब वास्तविक था।

कुछ लोग सम्मोहन में कुशल होते हैं। अन्य लोग इनके प्रभाव में आकर, अर्धचेतनावस्था में कुर्सी, मेज आदि इधर उधर हटा देते हैं या हिलाते हैं, अनुपस्थित वस्तु देखते या सुनते हैं। श्रद्धा से रोगमुक्ति का आधार भी सम्मोहन ही है। भीड़ मे दूसरों से प्रभावित होकर मनुष्य सम्मोहित व्यक्ति के सदृश आचरण करने लगता है। भावातिरेक में भीड़ों के विवेकहीन आचरण का यही कारण है।
उपयोग
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सम्मोहन का उपयोग कुछ रोगों को दूर करने में तथा प्रसव में किया जाता है। कुछ चिकित्सकों ने शल्यचिकित्सा में भी इसे वेदनाहर पाया है। सम्मोहन की कार्यपद्धति से मानस तथा मानसिक रोगों के अध्ययन में सहायता मिलती है
हमारे देश में सम्मोहन यानी हिप्नोटिज्म (Hypnotism) को एक चमत्कार के रूप में देखा जाता है। मन की बिखरी हुई शक्तियों को एकत्रित करके या एकाग्र करके उस बढ़ी हुई शक्ति से किसी को प्रभावित करना ही सम्मोहन विद्या है। सम्मोहन विद्या भारतवर्ष की प्राचीनतम और सर्वश्रेष्ठ विद्या है। इसकी जड़ें सुदूर गहराईयों तक स्थित हैं। प्राचीन ग्रंथों में सम्मोहन का जिक्र कठिन सिद्धि के रूप में किया गया है। सम्मोहन सदैव ही जिज्ञासा एवं आश्चर्य का विषय रहा है। भारत वासियों का जीवन अध्यात्म प्रधान रहा है और भारत वासियों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दर्शन और अध्यात्म को सर्वाधिक महत्व दिया है। इसीलिए सम्मोहन विद्या को भी प्राचीन समय से 'प्राण विद्या' या 'त्रिकालविद्या' के नाम से पुकारा जाता है। अंग्रेजी में इसे हिप्नोटिज्म कहते हैं।
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भारतीय दर्शन और भारतीय अध्यात्म, योग और उसकी शक्तियों से जुड़ा हुआ है। योग शब्द का अर्थ ही 'जुडऩा' है, यदि इस शब्द को आध्यात्मिक अर्थ में लेते हैं तो इसका मतलब आत्मा का परमात्मा से मिलन और दोनों का एकाकार हो जाना ही है। भक्त का भगवान से, मानव का ईश्वर से, व्यष्टि का समष्टि से, तथा पिण्ड का ब्रह्माण्ड से मिलन ही योग कहा गया है। हकीकत में देखा जाए तो यौगिक क्रियाओं का उद्देश्य मन को पूर्ण रूप से एकाग्र करके प्रभु यानि ईश्वर में समर्पित कर देना है। और इस समर्पण से जो शक्ति का अंश प्राप्त होता है, उसी को सम्मोहन शक्ति कहते हैं। सम्मोहन की शक्ति प्राप्त करने के लिए अनेक तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं।

सम्मोहन को विज्ञान और किंवदंतियों की सीमा रेखा भी कह सकते हैं। आजकल कई टीवी धारावाहिकों में सम्मोहन का इस्तेमाल रहस्य उत्पन्न करने के लिए भी किया जाता है जबकि विदेशों में इसे गंभीर विषय मानते हुए शोध हो रहे हैं। आधुनिक रूप से सम्मोहन 18वीं शताब्दी से प्रारंभ हुआ था। इसे अर्ध-विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित कराने का श्रेय ऑस्ट्रियावासी फ्रांस मेस्मर को है। हिप्नोटिज्म शब्द का आविष्कार 19वीं शताब्दी के डॉ. जेम्स ब्रेड ने किया।

सम्मोहन एक दिव्य और रहस्यमय कला है, सम्मोहन के अलग-अलग स्तर होते हैं, वास्तव में सम्मोहन काला जादू नाम की विद्या का ही एक हिस्सा है, काला जादू तंत्र शास्त्र का वो भाग होता है, जिसमें बिना मंत्र यन्त्र और औषधि आदि के मनोवांछित चमत्कार पैदा किया जा सकता है, वास्तव में तंत्र की मोहिनी विद्या का क्रिया पक्ष ही काला जादू के साधारण नाम से जाना जाता है, इस विद्या को प्रचार में नहीं लाया जाता था क्योंकि ये गुप्त विद्या कही जाती थी, किन्तु आज सम्मोहन विद्या का एक नया स्वरुप भी हमारे सामने है, जो विदेशों से आया जिसे हिप्नोटिज्म के नाम से जाना जाता है, हालांकि इस नए स्वरुप में वैज्ञानिक व्याख्या अधिक होने से बुद्धिवादीयों के बीच ये प्रमाणिक रूप से प्रचलित हुआ, पर इस विद्या का स्वरुप कहीं ज़्यादा बड़ा है।

क्या है सम्मोहन
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सम्मोहन का अर्थ आमतौर पर वशीकरण से लगाया जाता है। वशीकरण अर्थात किसी को वश में करने की विद्या, ‍ज‍बकि यह सम्मोहन की प्रतिष्ठा को गिराने वाली बात है। अधिकतर लोग समझते हैं कि सम्मोहन वह अवस्था है जिसमें मनुष्य अवचेतन अवस्था में रहता है। न तो वह जागता रहता है न ही वह सोता रहता है। उसकी इंद्रिया उसके वश में होती है। वह सब कुछ करता है लेकिन सम्मोहन करने वाले के इशारों पर। वह अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता में नहीं होता है।

हां यह बात सही भी है। लेकिन भगवान ने हम सभी को भीतर एक सम्मोहन दिया है जिसे हम समझ नहीं पाते हैं। लेकिन एक सच और है वह यह कि सम्मोहित वही होता है जो होना चाहता है। हम सब के भीतर अवचेतन मन में एक सम्मोहन क्षमता है। यही कारण है कि जब हम अपने अंतर मन की आवाज़ को वाकई सुनते हैं। ऐसा अक्सर लोगों के साथ तब होता है जब उन्हें तुरंत निर्णय लेना होता है और वह फैसला सही साबित होता है। यही कारण है कि जब हम कठिन परिस्थिति में कोई निर्णय लेते हैं तो हमें चमत्कारिक परिणाम मिलते हैं क्योंकि वही समय होता है जब चेतन मन और अवचेतन मन का संधि काल होता है।

इसका कारण यही है कि उस अवस्था में हम अपने अवचेतन मन की आवाज़ सुन रहे होते हैं बस यही सम्मोहन कला है। उस समय मन का वश आपके ऊपर नहीं चलता बल्कि आप मन पर अपना वश चला रहे होते हैं। जैसे जब हमें गुस्सा आता है तो हम उस पर नियंत्रण नहीं कर पाते। लेकिन बाद में हमें अपने ही गुस्से पर गुस्सा आने लगता है। कारण यही है कि उस समय हमारा पूरा ध्यान गुस्से पर होता है न कि किसी और चीज़ पर। उस समय हम सम्मोहन में होते हैं अपने गुस्से के सम्मोहन में।

बस ऐसा ही जीवन में हर चीज़ को पाने के लिए सम्मोहन का सिद्धांत ही काम करता है। जब आप किसी चीज़ पूरी तरह ध्यान लगा रहे होते हैं तो वह आपकी तरफ अपने आप चली आती है। बस देर है तो मन को याद दिलाने की। आपकी जरूरत क्या है यह याद करने की। जब आप किसी चीज़ को बार-बार मन को दोहराते हैं और सोच को सकारात्मक रखते हैं तो ऐसी कोई चीज़ नहीं जिसे आप नहीं पा सकते हैं या कहें सम्मोहित कर सकते हैं। अगर आप ऐसा करने लगेंगे तो ये सारी सृष्टि आपके लिए काम करने लगेगी आपको सहयोग करने लगेगी।

चेतन मन और अचेतन मन
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सम्मोहन व्यक्ति के मन की वह अवस्था है जिसमें उसका चेतन मन धीरे-धीरे निन्द्रा की अवस्था में चला जाता है और अर्धचेतन मन सम्मोहन की प्रक्रिया द्वारा निर्धारित कर दिया जाता है। साधारण नींद और सम्मोहन की नींद में अंतर होता है। साधारण नींद में हमारा चेतन मन अपने आप सो जाता है तथा अर्धचेतन मन जागृत हो जाता है।

इस परिवर्तन के लिए किसी बाहरी शक्ति का उपयोग नहीं होता, जबकि सम्मोहन निन्द्रा में सम्मोहनकर्ता चेतन मन को सुलाकर अचेतन को आगे लाता है और उसे सुझाव के अनुसार कार्य करने के लिए तैयार करता है। हर व्यक्ति का जीवन उसके या किसी और व्यक्ति के सुझावों पर चलता है। व्यक्ति को सम्मोहन करने के लिए उसकी पाँचों इंद्रियों के माध्यम से जो प्रभाव उसके मन पर डाला जाता है उसे ही यहाँ सुझाव कहते हैं।

हमारे मन की मुख्यतः दो अवस्थाएँ (कई स्तर) होती हैं : चेतन मन और अचेतन मन (आदिम आत्म चेतन मन)। हमारा अचेतन मन चेतन मन की अपेक्षा अधिक याद रखता है एवं सुझावों को ग्रहण करता है। आदिम आत्म चेतन मन न तो विचार करता है और न ही निर्णय लेता है। उक्त मन का संबंध हमारे सूक्ष्म शरीर से होता है। यह मन हमें आने वाले खतरे या उक्त खतरों से बचने के तरीके बताता है। इसे आप छटी इंद्री भी कह सकते हैं। यह मन लगातार हमारी रक्षा करता रहता है। हमें होने वाली बीमारी की यह मन छह माह पूर्व ही सूचना दे देता है और यदि हम बीमार हैं तो यह हमें स्वस्थ रखने का प्रयास करता है। बौद्धिकता और अहंकार के चलते हम उक्त मन की सुनी-अनसुनी कर देते है। उक्त मन को साधना ही सम्मोहन है।

क्या होगा इस मन को साधने से
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यह मन आपकी हर तरह की मदद करने के लिए तैयार है, बशर्ते आप इसके प्रति समर्पित हों। यह किसी के भी अतीत और भविष्य को जानने की क्षमता रखता है। आपके साथ घटने वाली घटनाओं के प्रति आपको सजग कर देगा, जिस कारण आप उक्त घटना को टालने के उपाय खोज लेंगे। आप स्वयं की ही नहीं दूसरों की बीमारी दूर करने की क्षमता भी हासिल कर सकते हैं।

सम्मोहन द्वारा मन की एकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपने संकल्प को पूर्ण कर लेता है। इससे विचारों का संप्रेषण (टेलीपैथिक), दूसरे के मनोभावों को ज्ञात करना, अदृश्य वस्तु या आत्मा को देखना और दूरस्थ दृश्यों को जाना जा सकता है।

सम्मोहित करने का तरीका
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बहुत से लोगों की धारणा है कि केवल कमजोर इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति को ही सम्मोहित किया जा सकता है। इसके विपरीत दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति को भी आसानी से सम्मोहित किया जा सकता है। हर व्यक्ति को सम्मोहित करने का तरीका समान नहीं होता। हर व्यक्ति के अनुसार सुझाव भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। हम अपने आप को भी विभिन्न प्रकार के सुझाव दे सकते हैं। रात्रि में अर्धजागृत अवस्था के दौरान वे सुझाव हम अपने आपको देकर आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।

मैं सब बातों में बेहतर होता जा रहा हूँ/रही हूँ।
मैं दिन-प्रतिदिन अपने कार्यों में कुशल होता जा रहा हूँ/रही हूँ।
मैं सदा स्वस्थ, प्रसन्नचित, उत्साहित रहता हूँ/रहती हूँ।
मैं अपनी सभी शुभ इच्छाएँ पूर्ण करने में समर्थ हूँ।
मेरा अपने क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण है, मैं चर्चा के समय उत्तेजित नहीं होता हूँ/होती हूँ।
मेरी स्मरण शक्ति अच्छी होती जा रही है, मुझे नई बातें सीखने में आसानी होती है।
मेरी भाषण देने की योग्यता बढ़ती जा रही है।
मेरा व्यक्तित्व आकर्षक एवं प्रभावशाली है।

ऐसे विभिन्न प्रकार के सुझाव हम रात को सोने के पूर्व अपने आपको अनेक बार देकर कुछ ही दिनों में चमत्कारिक परिणाम पा सकते हैं। बीमारियों के इलाज में भी हिप्नोथैरेपी कारगर सिद्ध हो सकती है। इसके जरिए असामान्य रोगों का भी उपचार संभव है। पिछले कुछ वर्षों से हुए शोध से हिप्नोथैरेपी मानसिक विकारों को दूर करने सहित पारिवारिक विवादों के हल में भी कारगर सिद्ध हुई है। इसके माध्यम से हम न केवल गुर्दा प्रत्यारोपण के समय की जाने वाली सर्जरी का तनाव कम कर सकते हैं, अपितु इसके माध्यम से हम प्रसव के समय होने वाली पीड़ा को भी कम कर सकते हैं।

कैसे साधें इस मन को
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प्राणायम से साधे प्रत्याहार को और प्रत्याहार से धारणा को। जब आपका मन स्थिर चित्त हो, एक ही दिशा में गमन करे और इसका अभ्यास गहराने लगे तब आप अपनी इंद्रियों में ऐसी शक्ति का अनुभव करने लगेंगे जिसको आम इंसान अनुभव नहीं कर सकता। इसको साधने के लिए त्राटक भी कर सकते हैं त्राटक भी कई प्रकार से किया जाता है।

ध्यान, प्राणायाम और नेत्र त्राटक द्वारा सम्मोहन की शक्ति को जगाया जा सकता है। त्राटक उपासना को हठयोग में दिव्य साधना से संबोधित किया गया है। आप उक्त साधना के बारे में जानकारी प्राप्त कर किसी योग्य गुरु के सान्निध्य में ही साधना करें। उक्त मन को सहज रूप से भी साधा जा सकता है। इसके लिए आप प्रतिदिन सुबह और शाम को प्राणायाम के साथ ध्यान करें।

अन्य तरीके
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कुछ लोग अँगूठे को आँखों की सीध में रखकर तो, कुछ लोग स्पाइरल (सम्मोहन चक्र), कुछ लोग घड़ी के पेंडुलम को हिलाते हुए, कुछ लोग लाल बल्ब को एकटक देखते हुए और कुछ लोग मोमबत्ती को एकटक देखते हुए भी उक्त साधना को करते हैं, लेकिन यह कितना सही है यह हम नहीं जानते।

योग पैकेज
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नियमित सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और योगनिंद्रा करते हुए ध्यान करें। ध्यान में विपश्यना और नादब्रह्म का उपयोग करें। प्रत्याहार का पालन करते हुए धारणा को साधने का प्रयास करें। संकल्प के प्रबल होने से धारणा को साधने में आसानी होगी है। संकल्प सधता है अभ्यास के महत्व को समझने से। इसके संबंध में ज़्यादा जानकारी के लिए मिलें किसी योग्य योग शिक्षक या सम्मोहनविद से।

श्रीराम और श्रीकृष्ण में सम्मोहन की विद्या
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सम्मोहन जागृत करना सामान्यत: आज के मानव के अति दुष्कर कार्य है। सम्मोहन विद्या का इतिहास आज या सौ-दो सौ साल पुराना नहीं बल्कि सम्मोहन प्राचीन काल से चला रहा है। श्रीराम और श्रीकृष्ण में सम्मोहन की विद्या जन्म से ही थी। वे जिसे देख लेते या कोई उन्हें देख लेता वह बस उनकी माया में खो जाता था। यहां हम बात करेंगे श्रीकृष्ण के सम्मोहन की। श्रीकृष्ण का एक नाम मोहन भी है। मोहन अर्थात सभी को मोहने वाला। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व और सुंदरता सभी का मन मोह लिया करती है। जिन श्रीकृष्ण की प्रतिमाएं इतनी सुंदर है वे खुद कितने सुंदर होंगे। श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में सम्मोहन की कई लीलाएं की हैं। उनकी मधुर मुस्कान और सुंदर रूप को देखकर गोकुल की गोपियां अपने आप को रोक नहीं पाती थी और उनके मोहवश सब कुछ भुलकर बस उनका संग पाने को लालायित हो जाती थी। श्रीकृष्ण ने माता यशोदा को भी अपने मुंह में पुरा ब्रह्मांड दिखाकर उस पल को उनकी याददाश्त से भुला दिया बस यही है सम्मोहन। श्रीकृष्ण जिसे जो दिखाना, समझाना और सुनाना चाहते हो वह इसी सम्मोहन के वश बस वैसा ही करता है जैसा श्रीकृष्ण चाहते हैं। ऐसी कई घटनाएं उनके जीवन से जुड़ी हैं जिनमें श्रीकृष्ण के सम्मोहन की झलक है
सम्मोहन विद्या को हासिल करने के लिए प्रथम सीढ़ी है त्राटक का अभ्यास। यही वह साधना है जिसका निरंतर अभ्यास करने से आपकी आंखों में अद्भुत चुंबकीय शक्ति जाग्रत होने लगती है और यही चुंबकीय शक्ति दूसरे प्राणी को सम्मोहित करके अपनी ओर आकर्षित करती है।विधिवत् रूप से शिक्षा लेना कोई आवश्यक नहीं है, क्योंकि यह तो मन और इच्छा शक्ति का ही खेल है। आप स्वयं के प्रयास, निरंतर अभ्यास और असीम धैर्य से सम्मोहन के प्रयोग सीखना आरंभ कर दें तो आप भी अपने अंदर यह अद्भुत शक्ति जाग्रत कर सकते हैं। यह विद्या मन की एकाग्रता और ध्यान, धारणा समाधि का ही मिला-जुला रूप है।

सम्मोहन में प्रवीणता हासिल करने के सिर्फ तीन ही नियम हैं। पहला अभ्यास, दूसरा और ज्यादा अभ्यास तथा तीसरा और अंतिम नियम है निरंतर अभ्यास।

इस विद्या को हासिल करने के लिए प्रथम सीढ़ी है त्राटक का अभ्यास। यही वह साधना है जिसका निरंतर अभ्यास करने से आपकी आंखों में अद्भुत चुंबकीय शक्ति जाग्रत होने लगती है और यही चुंबकीय शक्ति दूसरे प्राणी को सम्मोहित करके आकर्षित करती है। भारतीय मनीषियों ने जहां एक ओर सम्मोहन सीखने के लिए यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, प्राणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि जैसे आवश्यक तत्व निर्धारित किये हैं। वहीं दूसरी ओर पाश्चात्य विद्वानों और सम्मोहनवेत्ताओं ने हिप्नोटिज्म में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए सिर्फ प्राणायाम और त्राटक को अधिक महत्व दिया है। पाश्चात्यवेत्ताओं का मानना है कि श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण एवं त्राटक द्वारा नेत्रों में चुंबकीय शक्ति को जाग्रत करके ही मनुष्य सफल हिप्नोटिस्ट बन सकता है।

त्राटक के द्वारा ही मन को एकाग्र करके मनुष्य अपने मन पर नियंत्रण स्थापित कर सकता है। यहां हम अपने भारतीय ऋषि-मुनियों और सम्मोहनविज्ञों के दीर्घकालीन अनुभव का लाभ उठाते हुए उनके द्वारा प्रदत्त कुछ नियमों का भी यदि पालन कर सकें तो हम शीध्रता से सम्मोहन में कुशलता प्राप्त कर सकते हैं। आहार-विहार की शुद्धि, विचारों में सात्विकता, प्राणायाम-त्राटक और ध्यान का नियमित अभ्यास तथा असीम धैर्य और विश्वास के संयुग्मन से सम्मोहन विद्या को पूर्णता के साथ आत्मसात् किया जा सकता है। वैसे पाश्चात्यवेत्ताओं के मतानुसार सिर्फ प्राणायाम व त्राटक साधना करके भी सम्मोहन सीखने में कोई हानि नहीं है।

हिप्नोटिज्म का उपयोग मुख्यतः मनोवैज्ञानिक चिकित्सा में किया जाता है। शारीरिक एवं मानसिक रोगों के उपचार में इसका प्रयोग पूर्णतः सफल रहा है। पश्चिमी देशों में तो सम्मोहन को एक विज्ञान के रूप में कानूनी मान्यता प्राप्त हो चुकी है और वहां के समस्त अस्पतालों में अन्य चिकित्सकों, रोग-विशेषज्ञों की भांति हिप्नोटिस्ट्स (सम्मोहनवेत्ताओं) के लिए भी अलग से पद निर्धारित होते हैं। अब तो वहां की पुलिस भी अपराधों की रोकथाम करने एवं अपराधियों से अपराध कबूल करवाने में हिप्नोटिज्म का भरपूर उपयोग करने लगी है, परंतु विडम्बना यही है कि जिस देश में इस विद्या की उत्पत्ति हुई यानि भारतवर्ष में आज सैकड़ों वर्षों पश्चात् भी सम्मोहन को मान्यता नहीं मिल पायी है।
सम्मोहन का अभ्यास साधकों को अत्यधिक लाभ पहुंचाता है। जहां एक ओर उनकी आत्मिक शक्ति प्रबल होती है वहीं दूसरी ओर उनके आत्मविश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि होकर इच्छा-शक्ति सृदृढ़ हो जाती है। इन सबका साधक के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। फलस्वरूप उसका व्यक्तित्व चुंबकीय बन जाता है।

सम्मोहन विद्या का उपयोग सदैव दूसरों को लाभ पहुंचाने के लिए ही करना चाहिए। प्रतिकूल अथवा विरोधी भावना से किया गया सम्मोहन का प्रयोग प्रायः असफल ही रहता है। साधक को कभी भी अपनी इस शक्ति का अभिमान नहीं करना चाहिए। उसे इस शक्ति को जनकल्याण में उपयोग करना चाहिए। सम्मोहन का एक काला भाग यह भी है कि इस विद्या का उपयोग करके अपराध व अन्य बुरे कार्य भी करवाये जा सकते हैं लेकिन इस विद्या का दुरुपयोग करने के परिणामस्वरूप साधक की शक्ति का अत्यधिक अपव्यय होने लगता है और संचित शक्ति शीघ्र ही नष्ट हो जाती है अथवा साधक को मानसिक विकार उत्पन्न कर देती है।

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