रविवार, 9 दिसंबर 2012

पाप का गुरु कौन होता है

"पाप का गुरु कौन होता है"...............
एक पंडित जी कई वर्षों तक काशी में शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद अपने गांव लौटे। गांव के एक किसान ने उनसे पूछा, पंडित जी आप हमें यह बताइए कि पाप का गुरु कौन है? प्रश्न सुन कर पंडित जी चकरा गए, क्योंकि भौतिक व आध्यात्मिक गुरु तो होते हैं, लेकिन पाप का भी गुरु होता है, यह उनकी समझ और अध्ययन के बाहर था। पंडित जी को लगा कि उनका अध्ययन अभी अधूरा है, इसलिए वे फिर काशी लौटे। फिर अनेक गुरुओं से मिले। मगर उन्हें किसान के सवाल का जवाब नहीं मिला।अचानक एक दिन उनकी मुलाकात एक वेश्या से हो गई। उसने पंडित जी से उनकी परेशानी का कारण पूछा, तो उन्होंने अपनी समस्या बता दी। वेश्या बोली, पंडित जी! इसका उत्तर है तो बहुत ही आसान, लेकिन इसके लिए कुछ दिन आपको मेरे पड़ोस में रहना होगा। पंडित जी के हां कहने पर उसने अपने पास ही उनके रहने की अलग से व्यवस्था कर दी। पंडित जी किसी के हाथ का बना खाना नहीं खाते थे, नियम-आचार और धर्म के कट्टर अनुयायी थे। इसलिए अपने हाथ से खाना बनाते और खाते। इस प्रकार से कुछ दिन बड़े आराम से बीते, लेकिन
सवाल का जवाब अभी नहीं मिला। एक दिन वेश्या बोली, पंडित जी! आपको बहुत तकलीफ होती है खाना बनाने में। और तीन-चार घंटे बीत जाते हैं। यहां देखने वाला तो और कोई है नहीं। आप कहें तो मैं नहा-धोकर आपके लिए कुछ भोजन तैयार कर दिया करूं। आप मुझे यह सेवा का मौका दें, तो मैं दक्षिणा में पांच स्वर्ण मुद्राएं भी प्रतिदिन दूंगी।
स्वर्ण मुद्रा का नाम सुन कर पंडित जी को लोभ आ गया। साथ में पका-पकाया भोजन। अर्थात दोनों हाथों में लड्डू। इस लोभ में पंडित जी अपना नियम-व्रत, आचार-विचार धर्म सब कुछ भूल गए। पंडित जी ने हामी भर दी और वेश्या से बोले, ठीक है, तुम्हारी जैसी इच्छा। लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखना कि कोई देखे नहीं तुम्हें मेरी कोठी में आते-जाते हुए। वेश्या ने पहले ही दिन कई प्रकार के पकवान बनाकर पंडित जी के सामने परोस दिया। पर ज्यों ही पंडित जी खाने को तत्पर हुए, त्यों ही वेश्या ने उनके सामने से परोसी हुई थाली खींच ली। इस पर पंडित जी क्रुद्ध हो गए और बोले, यह क्या मजाक है? वेश्या ने कहा, यह मजाक नहीं है पंडित जी, यह तो आपके प्रश्न का उत्तर है। यहां आने से पहले आप भोजन तो दूर, किसी के हाथ का पानी भी नहीं पीते थे, मगर स्वर्ण मुद्राओं के लोभ में आपने मेरे हाथ का बना खाना भी स्वीकार कर लिया। यह लोभ ही पाप का गुरु है। कोई लोभ न करे, तो वह पाप भी नहीं करेगा।
आज हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि बड़े-बड़े राजनेता करोड़ों के घोटालों में फंसे हुए हैं, जबकि उनके पास अकूत संपत्ति है और भौतिक साधनों की भरमार है। मात्र लोभ के पाश में इतने जकड़ जाते हैं कि उन्हें अपने मान-सम्मान की मर्यादा का भी ख्याल नहीं रहता। लोभ अच्छे से अच्छे विवेकी या बुद्धिमान को अंधा बना देता है। बड़े-बड़े नौकरशाह भी मोटी रकम रिश्वत में लेकर बहुत बड़ा अनर्थ कर रहे हैं और जब केस में पकड़े जाते हैं तो जिंदगी भर पछताते हैं। अच्छे- बुरे लोग हर युग में रहे हैं। विवेकी लोग कभी लोभ के वशीभूत नहीं हुए और नासमझ लोभ में फंस कर तबाह हुए। लोभ के कारण अभिमान भी आ जाता है। और ये दोनों मिलकर ऐसा जाल बुन देते हैं कि इससे बचना मुश्किल हो जाता है। मनुष्य पहले खुद ही गड्ढा खोदता है और उसमें गिरता है। फिर कहता है, हे भगवान! मुझे बचाओ।

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