यह ब्लॉग खोजें

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

खीर खाओ मलेरिया भगाओ:

खीर खाओ मलेरिया भगाओ:


हम सब जानते है की मच्छर काटने से मलेरिया होता है वर्ष मे कम से कम 700-800 बार तो मच्छर काटते ही होंगे अर्थात 70 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते लाख बा
र मच्छर काट लेते होंगे । लेकिन अधिकांश लोगो को जीवनभर में एक दो बार ही मलेरिया होता है सारांश यह है की मच्छर के काटने से मलेरिया होता है यह 1% ही सही है ।


लेकिन यहाँ ऐसे विज्ञापनो की कमी नहीं है जो कहते है की एक भी मच्छर ‘डेंजरस’ है, हिट लाओगे तो एक भी मच्छर नहीं बचेगा अब ऐसे विज्ञापनो के झांसे मे आकर के करोड़ो लोग इस मच्छर बाजार मे अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो जाते है । सभी जानते है बैक्टीरिया बिना उपयुक्त वातावरन के नहीं पनप सकते जैसे दूध मे दही डालने मात्र से दही नहीं बनाता, दूध हल्का गरम होना चाहिए, उसे ढककर गरम वातावरण मे रखना होता है । बार बार हिलाने से भी दही नहीं जमता ऐसे ही मलेरिया के बैक्टीरिया को जब पिट का वातावरन मिलता है तभी वह 4 दिन में पूरे शरीर में फैलता है नहीं तो थोड़े समय में खत्म हो जाता है सारे मच्छरमार प्रयासो के बाद भी मच्छर और रोगवाहक सूक्ष्म किट नहीं काटेंगे यह हमारे हाथ में नहीं लेकिन पित्त को नियंत्रित रखना हमारे हाथ में तो है ? अब हमारी परम्पराओं का चमत्कार देखिये जिन्हे अल्पज्ञानी, दक़ियानूसी, और पिछड़ेपन की सोच करके, षड्यंत्र फैलाया जाता था ।

वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु आती है आकाश में बादल धूल न होने से कडक धूप पड़ती है जिससे शरीर में पित्त कुपित होता है इसी समय गड्ढो मे जमा पानी के कारण बहुत बड़ी मात्र मे मच्छर पैदा होते है इससे मलेरिया होने का खतरा सबसे अधिक होता है ।

खीर खाने से पित्त का शमन होता है । शरद में ही पितृ पक्ष (श्राद्ध) आता है पितरों का मुख्य भोजन है खीर । इस दौरान 5-7 बार खीर खाना हो जाता है इसके बाद शरद पुर्णिमा को रातभर चाँदनी के नीचे चाँदी के पात्र में राखी खीर सुबह खाई जाती है (चाँदी का पात्र न हो तो चाँदी का चम्मच खीर मे डाल दे , लेकिन बर्तन मिट्टी या पीतल का हो, क्योंकि स्टील जहर और एल्यूमिनियम, प्लास्टिक, चीनी मिट्टी महा-जहर है) यह खीर विशेष ठंडक पहुंचाती है । गाय के दूध की हो तो अतिउत्तम, विशेष गुणकारी (आयुर्वेद मे घी से अर्थात गौ घी और दूध गौ का) इससे मलेरिया होने की संभावना नहीं के बराबर हो जाती है

ध्यान रहे : इस ऋतु में बनाई खीर में केसर और मेंवों का प्रयोग न करे ।

मलेरिया होने के बाद कड़वी दवाइयाँ खाकर, हजारों रूपए खर्चकर, जोखिम उठाकर ठीक होने में अधिक वैज्ञानिकता हैं या स्वादिष्ट व पौष्ठिक खीर खाकर मलेरिया होने ही न देने में अधिक वैज्ञानिकता ? आज भयंकर षड्यंत्र के तहत आयुर्वेद की शिक्षा नहीं दी जा रही है बड़ी धूर्तता के साथ स्कूलो में यह धारणा बैठा दी गई है की आयुर्वेद मात्र जड़ी बूटी चिकित्साशास्त्र है जबकि जड़ी बूटी तो मात्र आयुर्वेद का 10% ही है 90% आयुर्वेद तो हमारी समृद्ध परम्पराओं में है, जो वैज्ञानिक आधार सहित थी ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणी करें

टिप्पणी: केवल इस ब्लॉग का सदस्य टिप्पणी भेज सकता है.

function disabled

Old Post from Sanwariya