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शनिवार, 21 अगस्त 2021

सुख-दुःख का सम्बन्ध सन्तान से नहीं


 सुख-दुःख का सम्बन्ध सन्तान से नहीं


एक बुजुर्ग आदमी स्टेशन पर गाड़ी में चाय बेचता है।गाड़ी में चाय बेच कर वह अपनी झोपड़ी में चला गया। झोपड़ी में जा कर अपनी बुजुर्ग पत्नी से कहा कि दूसरी ट्रेन आने से पहले एक और केतली चाय की बना दो।दोनों बहुत बुजुर्ग हैं। आदमी बोला कि काश हमारी कोई औलाद होती, तो वह हमें इस बुढ़ापे में कमा कर खिलाती, औलाद न होने के कारण हमें इस बुढ़ापे में भी काम करना पड़ रहा है। उसकी पत्नी की आँखों में आँसू आ गए।उसने चाय की केतली भर कर अपने पति को दे दी।
बुजुर्ग आदमी चाय की केतली ले कर वापिस स्टेशन पर गया। उसने वहाँ प्लेटफॉर्म पर एक बुजुर्ग दम्पती को सुबह से लेकर शाम तक बेंच पर बैठे देखा। वे दोनों किसी भी गाड़ी में चढ़ नहीं रहे थे। तब वह चाय वाला बुजुर्ग उन दोनों के पास गया और उन से पूछने लगा कि आप ने कौन सी गाड़ी से जाना है? मैं आप को बता दूँगा कि आप की गाड़ी कब और कहाँ आएगी?
तब वह बुजुर्ग दम्पती बोले कि हमें कहीं नहीं जाना है।हमें हमारे छोटे बेटे ने यहाँ एक चिट्ठी दे कर भेजा है और कहा है कि हमारा बड़ा बेटा हमें लेने स्टेशन आएगा और अगर बड़ा बेटा ना पहुँचे तो इस चिट्ठी में जो पता है, वहाँ आप पहुँच जाना।हमें तो पढ़ना लिखना आता नहीं है, आप हमें बस यह चिट्ठी पढ़ कर यह बता दो कि यह पता कहाँ का है, ताकि हम लोग अपने बड़े बेटे के पास पहुँच जायें।

चाय वाले ने जब वह चिट्ठी पढ़ी वह वही जमीन पर गिर पड़ा। उस चिट्ठी में लिखा था कि ये मेरे माता पिता हैं, जो इस चिट्ठी को पढ़े वह इनको पास के किसी वृद्धाश्रम में छोड़ आये।
चाय वाले ने सोचा था कि मैं बेऔलाद हूँ, इसलिए बुढ़ापे में काम कर रहा हूँ, अगर औलाद होती तो काम न करना पड़ता।इस बुजुर्ग दम्पती के दो बेटे हैं, पर कोई भी बेटा इनको रखने को तैयार नहीं है।

बाबा नंद सिंह जी संगत को यह घटना सुनाते थे और संगत से पूछते थे कि बताओ औलाद होनी चाहिए या नहीं। सुख-दुःख तो अपने कर्मों के अनुसार मिलता है, न कोई औलाद सुख देती है न कोई औलाद दुःख देती है। सुख और दुःख का औलाद से कोई कनेक्शन नहीं है।ये हमारी ग़लतफ़हमी है।

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